एक समय की बात है, काशी निवासी धनंजय की पत्नी का नाम सुलक्षणा था. उसे अन्य सब सुख प्राप्त थे, केवल निर्धनता ही उसके दुःख का एक मात्र कारण थी. यह दुःख उसे हर समय सताता रहता था. एक दिन सुलक्षणा पति से बोली- स्वामी! आप कुछ उद्यम करो तो काम चले. इस प्रकार कब तक काम चलेगा? सुलक्षणा की बात धनंजय के मन में बैठ गई और वह उसी दिन विश्वनाथ शंकर जी को प्रसन्न करने के लिए बैठ गया और कहने लगा- हे देवाधिदेव विश्वेश्वर! मुझे पूजा-पाठ कुछ आता नहीं है, केवल आपके भरोसे बैठा हूं. इतनी विनती करके वह दो-तीन दिन भूखा-प्यासा बैठा रहा. यह देखकर भगवान शंकर ने उसके कान में अन्नपूर्णा! अन्नपूर्णा! अन्नपूर्णा!
इस प्रकार तीन बार कहा. यह कौन, क्या कह गया? इसी सोच में धनंजय पड़ गया कि मन्दिर से आते ब्राह्मणों को देखकर पूछने लगा- पंडितजी! अन्नपूर्णा कौन है? ब्राह्मणों ने कहा- तू अन्न छोड़ बैठा है, सो तुझे अन्न की ही बात सूझती है. जा घर जाकर अन्न ग्रहण कर. धनंजय घर गया, स्त्री से सारी बात कही. वह बोली- नाथ! चिंता मत करो, स्वयं शंकरजी ने यह मंत्र दिया है.